माँ ज्वाल्पा देवी का पौराणिक इतिहास

अष्टषष्ट्युत्तरशततमोऽध्यायः
अथाष्टषष्ट्युत्तरशततमोऽध्यायः
स्कन्द उवाच

अथान्यच्छ्र्णु पीठं वै देव्याः परमकं शिवम् । पुण्ये नवालाकातीरे तन्मानं योजनार्द्धकम् ।।

अतिपुण्यतम पीठं सद्यः प्रत्ययकारकं । दीप्तज्वालेश्वरी सर्वसिद्धिप्रदायिनी ।।

पूर्व तत्र पुलोम्नश्च कन्ययाराधिता परा । द्रष्टा तयाप्रदीप्ताग्निज्वालेव नगकन्यका ।।

ततः सर्वे मुनिगणा दीप्तज्वालेति तां विदुः। इन्द्रासनार्द्धसम्प्राप्तिर्जाता तस्या महामते ।।

नारद उवाच

पुलोमकन्यया स्कन्द कथमाराधिता सती । कथमिन्द्रस्य पत्नी सा जाता तद्धद मे प्रभो ।।

स्कन्द उवाच

श्रर्णु देव पुरावृत्तं सर्वपापप्रणाशनम् । पुलोमजा यथा कन्या देवी माराधयत्सयतीम् ।।

दैत्यवर्यः पुलोमाभूत्सर्वसत्त्वभयंकरः । तस्य कन्येयमाख्याता शची नाम्नेति विश्रुता ।।

एकदा सा सखीभिस्तु वेष्टिता हिमवदिगरिम् । ययौ द्रष्टुम विमानेन कामगेन महामते ।।

पश्यन्ती सा महाशोभां शची वै हिमवदिगरे: । नानानदीनदाकीर्णतीर्थराजोपशोभितम ।।

नानालिङगशताकीर्ण नानाप्रस्त्रवणैर्युतम् । नानामृगगणैर्जुष्टं । सिंहव्याघृनिषेवितम् ।।

नानापक्षिशताघुश्तम दृष्टिरम्यशिवालयम् । प्रमर्थस्तु तदाकीर्ण देवीदेवनिषेवितम् ।।

दृष्ट्‌वा हिमालयं दिव्यं गङ्गाधारोर्मिमालिनम् । विजहार शची तत्र सवयस्कसखीवृता ।।

एतस्मिन्नन्तरे तत्र शिवदर्शनलालसः। आययौ वासवो देवः सर्वदेवगणैयुर्तः ।।

ऐरावतसमारुडो गन्धर्वगणशोभितः। किन्नरेर्गीयमानो वै त्वप्सरोरगणशोभितः ।।

नानाविभूतिनिर्युक्तो लोकपालगणैरवृतः । दृष्ट्‌वा विभूतिमन्तं तमिन्द्र वृत्तनिशूदनम ।।

चकमे सा पर्ति तं व पुलोमतनया शची । अपृच्छत्सा सखी काचित्कथमिन्द्रः पतिर्भवेत् ।।

सावदत्सहसा बालां यौवनोन्मुखशालिनीम् । पुण्येन लभ्यते भर्ता सानुरूपोऽनुकूलकः ।।

पुण्यं तु त्रिविधं ख्यातं तीर्थसेवनजं तथा । दानजन्यं व्रतमवं चतुर्थ नैव विद्यते ।।

इदं हिमवतः स्थानं देवानामपि दुर्लभम्। अन्नाराधय देवेशीं महोदवीं पुलोमजे ।।

ततः संपत्स्यते सर्वं यद्यन्मनसि वर्तते । इति सख्या वचः श्रुत्वा पुलोमतनया शची ।।

नवालकातटे पुण्ये देवर्षिगणसेविते । चकार पूजनं देव्या अष्टम्यां विधिवन्मुने ।।

धूपदीपेस्तु नैवेद्यैर्बलिभिश्च तथापरैः। निराहारा तन्मनस्का देवी ध्यानपरायणा ।।

एवं तस्या ययौ कालो महान्वै वर्षसम्मितः। ततोर्द्धरात्रमये ददर्श जगदम्बिकाम् ।।

कोटिसूर्यप्रतीकाशां दीप्तज्वालाम महेश्वरीम् । दृष्ट्वा तां प्रणमद्‌भूमौ दण्डवत्पत्तिता शची ।।

पतिर्मे दीयता शक्रस्त्वया विश्वविभाविनि । एवमस्त्विति साप्युक्त्वा तत्रैवान्तर्दधे शिवा ।।

तद्वरस्य प्रभावेण वृता सेन्देण वै शची । इतीदं कथितं विप्र यथा राच्या कृतं तपः।।

नवालकाप्रभावश्च यत्स्नानात्पुण्यमाप्नुयात् । नित्यं स्नाति पुमान्यस्तु विधिना सरिति स्वयम् ।। यत्फलं प्राप्यते तेन श्रृणु सर्वमशेषतः ।।

सर्वयज्ञेषु यत्पुण्यम सर्वतीर्थेषु यत्फलम्। तत्फलं समवाप्नोति तेन चैकेन कर्मणा ।

इति ते कथितं दिव्यं दीप्तजवालेश्वरीस्थलम् ।।

अध्याय 168

दीप्त ज्वालेश्वरी (माँ ज्वाल्पा देवी)

स्कन्द बोले-अब दूसरी देवी की परम कल्याणकारक पीठ सुनो । नवालका के पवित्रतट पर दो कोस की दूरी पर अत्यंत पवित्र पीठ सद्यः विश्वास दिलाने वाला है। वहीं दीप्तज्वालेश्वरी सकलसिद्धिदायिनी के रूप में प्रसिद्ध है । पूर्वकाल में वहीं पुलोमा की पुत्री (शची) ने परा भगवती की आराधना की । तब उसे पार्वती प्रदीप्त अग्निज्वाला के समान दिखाई पड़ीं । तब सभी मुनिगणों ने उसे प्रदीप्त ज्वाला समझा । महामते । पुलोमपुत्री को अर्धइन्द्रासन की प्राप्ति हुई  ।

नारद बोले-स्कन्द ! पुलोमपुत्री ने सती की आराधना कैसे की ? वह कैसे इन्द्र की पत्नी बनी ? प्रभो वह मुझे बताएँ ।

स्कन्द बोले – देव ! सकल पापनाशक पुराकालिक वृत्तांत सुनो । जिस प्रकार पुलोमपुत्री ने सती देवी की आराधन की । दैत्यवर पुलोमा सभी प्राणियों के लिए भयंकर हुआ। उसकी यह कन्या शची नाम से प्रसिद्ध हुई । महामते । एक बार वह सखियों से युक्त होकर हिमालय को देखने के लिए यथेच्छाचारी विमान से गयी । शची हिमवर्तत की महाशोभा देखने लगी। हिमालय नाना नदियों और नदों से व्याप्त, तीर्थराजों से उपशोभित, सैकड़ों शिवलिगों से परिपूर्ण, अनेक झरनों से युक्त, नानामृगगणों तथा सिंह- व्याघ्रों से सेवित, सैकड़ों पक्षियों से शब्दित देखने में मनोरम शिवालयों से युक्त, प्रथमगणों से व्याप्त देवियों और देवों से सेवित था । अनेक प्रकार के सैकड़ों पक्षी वहाँ विद्यमान थे, देखने में मनोहर शिवालय विद्यमान थे, उन शिवमंदिरों में शिवगण तथा देवी, देव सेवा कर रहे थे । ऐसे दिव्य और गंगधारा की तरंगमालाओं से युक्त हिमालय को देखकर शची वयस्क सखियों के साथ विहार करने लगी । इस बीच वहाँ शिवदर्शन की लालसा से इन्द्र सभी देवगणों से युक्त होकर आये । वे ऐरावत पर सवार गन्धर्वगणों तथा अप्सराओं से सुशोभित, अनेक विभूतियों से युक्त और लोकपालगणों से आवृत्त थे। उसे ऐश्वर्यशाली वृत्रासुरहन्ता इन्द्र को देखकर वह पुलोमपुत्री शची उसकी कामना करने लगी। उसने किसी सखी से पूछा कि इन्द्र कैसे पतिरूप में प्राप्त होगें। उसने यौवन की ओर बढ़ती हुई बाला से कहा-अनुरूप और अनुकूल पति पुण्य से प्राप्त होता है । पुण्य तीन प्रकार का कहा गया है- तीर्थसेवन से उत्पन्न, दान से उत्पन्न और व्रत से उत्पन्न। चौथा नहीं है । वह हिमालय का स्थान देवताओं के लिए दुर्लभ है। पुलोमपुत्री। यहाँ देवों की ईश्वरी महादेवी की आराधना करो । तब जो तुम्हारे मन के तट पर अष्टमी तिथि को धूप, दीप, नैवेद्य तथा अन्य उपहारों से, निराहार, दत्तचित्त एव देवीध्यान परायण होकर विधिपूर्वक देवी का पूजन किया । इस प्रकार करते हुए उसके कई वर्षों का महान् समय बीत गया। तब आधी रात के समय उसने जगदम्बा को देखा । करोड़ो सूर्य के समान प्रदीप्त ज्वालास्वरूप उस महेश्वरी को देखकर शची भूमि पर दण्डवत् प्रणाम करके गिर पड़ी और बोली । हे विश्व को उत्पन्न करने वाली! मुझे इन्द्रपति दीजिए। वह शिवा भी अच्छा कहकर वहीं अन्तर्हित हो गई । उस वर के प्रभाव से इन्द्र ने शची का वरण किया विप्र जैसा कि सची ने तप किया वह और नवालका का प्रभाव मैने बता दिया। जिसमें स्नान करने से पुण्य प्राप्त होता है। जो मनुष्य उस नदी में नित्य विधिपूर्वक स्नान करता है, उसे जो फल प्राप्त होता है वह सब अशेभतः सुनो । सभी यज्ञों और सभी तीर्थों में जो पुण्य फल प्राप्त होता है, वह फल उसे एक कर्म नवालका में नित्यस्नान से प्राप्त होता है । यह मैने दिव्य दीप्तज्वालेश्वरीस्थल को बता दिया ।

माँ ज्वाल्पा देवी की स्थापना कथा

सिद्धपीठ माँ ज्वाल्पा देवी की स्थापना
(सन् 1815 से पहले हुई)
प्राचीन काल में सारा गढ़वाल टेहरी नरेश के आधीन था यहाँ की जनता बड़ी मेहनती थी खेतीबाडी तथा पशुओं को पालकर अपना गुजारा करती थी और खुशहाल थी केवल नमक, गुड, कपड़ा आदि जरूरी चीजों के लिए 20, 25 आदमियों के दल में दूर मंडी में जाना पडता था जिसको उस समय ढाकर कहते थे।
जहाँ अभी माँ ज्वाल्पा देवी ज्वाल्पाधाम है। इस स्थान को पहले अमकोटी कहते थे यह सारा इलाका नदी के किनारे तक अणेथ गाँव का और नदी के किनारे और मैदानी होने से दूर – दूर के गाँवों के लोग यहाँ पर भेड़, बकरी, गाय, भैंस पालते और व्यापार करते थे जो कि कई झुण्डों में रहते थे जिसको खरक कहते थे।
यह स्थान बहुत प्रसिद्ध था क्यों कि यहाँ से चारों ओर सड़कें जाती थी। एक सड़क यहाँ से कफोलस्यूँ पैडुलस्यूँ होती पौड़ी जाती थी एक सड़क खतस्यूँ होती मुरांग ली जाती थी एक सड़क रिंगवाडस्यूँ होती नौगाँव व खस होती पोखड़ा जाती थी सब से बड़ी सड़क चौंदकोट होती आमोढा, दनगल, रेतपुर, गुमखाल, दुग्गडा होती नजीमाबाद मंडी जाती थी। यहाँ पर ढाकिरियो का पडाव था कफोलस्यूँ पेडेलस्यूँ और खातस्यूँ के ढाकिरी यहा पर रात को विश्राम करते थे।

एक किंवदन्ती के अनुसार इन्द्रप्रस्थ दिल्ली में विद्यमान देवी देवताओं को राक्षस (यवन) तंग करने लगे थे अतः देवताओं ने दिल्ली छोड़कर उत्तराखण्ड की पावन भूमि जाने का मन बना लिया, उनमें वीर भैरव और पाँच अन्य देवियाँ माँ भुवनेश्वरी, माँ ज्वाल्पादेवी, माता राजेश्वरी, माँ बाल सुन्दरी और माँ बालकुवांरी थी जोकि मातृलिंग (लोड़ी) के रूप में प्रथम पड़ाव नजीवाबाद मंडी पहुँची।

एक दिन खातस्यूँ के ढाकरियों का दल ढाकर के लिये नजीवावाद मंडी पहुंचा उन्होंने अपनी जरूरत के अनुसार नमक, गुड़, कपड़ा आदि जरूरत का सामान खरीदा उन में से एक ढाकिरी के नमक के बोरे में मातृलिंग (लोड़ी) प्रवेश कर गई।
ढाकिरियों का दल वापिस जब आखिरी पढ़ाव अमकोटी पहुचां, वहाँ पर उन्होंने रात को खाना खाया और विश्राम किया। सुबह सभी ढाकिरी अपने अपने बोरे उठाकर चलने लगे तो उन में से एक ढाकिरी से अपना बोरा उठ ही नही सका। जिसको कि वह नजीबावाद से खुशी-खुशी लाया था। आखिर में उसने बोरा खोला तो देखा कि उसमें मातृलिंग (लोड़ी) पड़ी थी उसने उसे पत्थर का टुकड़ा समझकर नंदी के किनारे एक बेरी के झाड़ में फेंक दिया। मातृलिंग (लोड़ी) के निकलने से उसका बोरा हलका हो गया और वह अपने गाँव चला गया।
मातृलिंग के बेरी के झाड़ में गिरने के बाद वहां पर माँ ज्वाल्पादेवी और माँ काली की मूर्ति एक शिला के रूप में प्रकट हो गई। दूसरे दिन से खरक वाले की एक भैंस बेरी के झाड़ में जाती और शिला के ऊपर अपना दूध गिराकर आ जाती थी। एक दिन खरक वाले ने भैंस को बेरी की झाड़ में जाते देखा, उसने सोचा भैंस बेरी के झाड़ में क्यों गई वह भी बेरी के झाड में गया और शिला में दूध गिरा देखा उसने शिला के ऊपर मिटटी डाल दी और  दूसरे दिन से भैंस को उधर नहीं जाने दिया। उसी दिन रात को सिद्धपीठ माँ ज्वाल्पा देवी अणेथ गाँव के प्रधान श्री रामदेव जी अण्थ्वाल के सपनें में आई।

माँ ने कहा कि मैं नमक के बोरे में मातृलिंग के रूप में यहाँ आई हूँ । मुझे यह स्थान अच्छा लगा। मैं आज से तुम्हारी ईष्ट देवी सिद्धपीठ माँ ज्वाल्पा देवी हो गई । इसलिये तुम यहाँ आकर, यहां पर मेरा सुन्दर मन्दिर बनाकर मेरी अखण्डज्योति के साथ मेरी पूजा अर्चना करना शुरू कर दो। मेरी पूजा का अधिकार केवल तुम्हारे वंश (अणथ्वाल वंश) को ही होगा।
दूसरे दिन सुबह होते ही श्री रामदेव जी अणथ्वाल, अपने और अणथ्वाल बन्धुओं के साथ अमकोटी गये उन्होंने बेरी के झाड़ के नीचे शिला को देखा और उस स्थान को साफ कर वहाँ पर मिट्टी का एक छोटा सा मन्दिर बनाकर सिद्धपीठ माँ ज्वाल्पा देवी की प्राण प्रतिष्ठाकर अखण्ड ज्योति के साथ माँ की पूजा अर्चना कर सिद्ध पीठ माँ ज्वालपादेवी, की स्थापना कर दी और उसी दिन से यह स्थान अमकोटी की जगह श्री ज्वाल्पाधाम कहलाने लगा।
श्री रामदेवजी अण्थ्वाल अपने अण्थ्वाल बंधुओं के साथ मन्दिर के सामने एक कुटिया बनाकर धुनी रमाकर माता की सेवा करने लगे। जब लोगों को पता चला कि अमकोटी में सिद्धपीठ माँ ज्वाल्पा देवी प्रकट हुई है तो आसपास के गाँवों के लोगों का माता के दर्शनों के लिए तांता लग गया। माता की ख्याति चारों और फैल गई और बडी दूर से लोग माता के दर्शनों को आने लगें और धनी लोगों ने वहाँ पर यात्रियों के लिये धर्मशालायें बना दी थी। एक बडी तिवारी जहां पर अभी प्रवचनशाला है वहां पर थी। एक बड़ी धर्मशाला चार मंजिल जिसको खोल कहते थे, वहां पर थी जहां अभी तीन मंजिल धर्मशाला है तब से यह स्थान खास तीर्थ स्थान बन गया था।
श्रीराम देवजी अण्थ्वाल ज्ञानी, त्रिकालदर्शी सतयुगी पुरुष थे। उन्होंने अणेथ गॉक्को चार चोकों में बाँट दिया था और माता की पूजा अर्चना अखण्ड ज्योति सेवा सफाई भी चारों चोकों में दिनों के हिसाब से बाँट दी थी। तबसे गाँव के अण्थ्वाल बन्धु का हर परिवार अपनी बारी पर आकर माँ की पूजा आरती और अखण्ड ज्योति की रक्षा तथा सेवा सफाई करता है यही प्रथा कई पीढ़ियों से आज तक चली आ रही है। मन्दिर की व्यवस्था के रख रखाव के लिये अणथ्वाल बन्धुओं की एक पूजा समिति भी बनी हुई है।

इस मन्दिर में बारह महीनें अविरल रूप में माँ की अखण्ड ज्योति लगातार जलती रहती है। इस सिद्ध पीठ में स्थापित माँ ज्वाल्पा देवी अपने भक्तों की मनोकामना पूर्ण करती है। यह मेरा अटल विश्वास है। नवरात्रों में माँ की विशेष पूजा अर्चना हाती है और भन्डारें भी होते है इसलिऐ यहां पर भक्तों की अपार भीड़ लगी रहती है।

एक दिन भवालस्यूँ खेड़े गाँव के थपलियाल जी जो कि टेहरी नरेश के कर्मचारी थे। वे माता के दर्शनों के लिये माँ ज्वाल्पा देवी धाम आए और उन्होंने श्री रामदेव जी अणथ्वाल से कहा कि मैं टेहरी नेरश का कर्मचारी हूँ और नरेश से तुम्हारी कुछ मदद करने को कहूंगा और मैं भी माता की सेवा करना चाहता हू । श्री राम देव जी अणथ्वाल ने कहा अगर आप भी माता की सेवा करना चाहते हो तो आप असूज और चैत्र के नवरात्रों में माता की सेवा किया करो। थपलियाल जी की सिफारिश पर टेहरी नरेश ने अणेथ, खैड़ ओर सिमतोली गांवों की किस्त माफ कर दी थी।
थपलियालजी के खास बन्धु सिमतोली गाँव भी रहते थे फिर खेड और सिमतोली गाँव के थपलियाल बन्धु भी माता की पूजा अर्चना करने लगे असूज के नवरात्रों में वे माता का पाठ करते थे और अष्ठमी को एक भैसा (बग्गी) और कई बकरे मारते थे, और चैत्र के नवरात्रों में पाठ करते और नारियल की बली देते थे। यह कार्य खेड़ें और सीमन्त के गांव के थपलियाल बन्धु बारी-बारी से करते थे।
 एक समय गोरखों ने टेहरी नरेश पर हमला कर दिया, उन्होंने वहां के मंदिरों की मूर्तियां तोड़ी और मंदिर भी तोड़े और अनेक किस्म के अत्याचार और अनाचार किये। उन से लड़ने के लिये नरेश ने अंग्रेजों से मदद मांगी। सन् 1815 आरेनाला पानी में भंयकर युद्ध हुआ और अग्रेजो की सहायता से नरेश ने गोरखों को भगाया। नाला पानी युद्ध में नरेश की, सहायता करने के बाद अंग्रेजों ने युद्ध मुआवजे के रूप में नरेश से गंगांवार का सारा इलाका ले लिया जो बाद में पौड़ी जिला बना। तब से गगांवार का इलाका अग्रेंजों के आधीन हो गया और वहां अंग्रेजों के कानून चलने लगे। आजादी मिलने के बाद जब मोटर मार्ग शुरू हुआ तब यहाँ पर कुछ नई हलचल शुरू हुई, एक दिन भवालस्यूँ मासों गाँव के श्री दिगम्बर दत्तजी थपालियालजी माता के दर्शनों को माता के मन्दिर में आये और उन्होंने बड़ी श्रद्धा से माता की पूजा अर्चना की। उनको प्रेरणा हुई कि माता की सेवा की जाय उन्होने सबसे पहले मन्दिर के चौक में एक हवन कुण्ड बनवाया। फिर उन्होंने थपलियाल बन्धुओं की एक कमेटी बनाई और श्री बूथारामजी अण्थ्वाल और चिन्तामणी जी अण्थ्वाल से कुछ जमीन लेकर एक बड़ी धर्मशाला बनाकर संस्कृत पाठशाला खोलकर सामाजिक कार्य करने शुरू कर दिये। साथ ही दोनों नवरात्रों में मौका पाठ, पूजा अर्चना करने लगे। इससे अब सिद्ध पीठ माँ ज्वाल्पा देवी धाम में पुराने जमाने से भी ज्यादा रौनक आ गई।

अतः मेरी सिद्ध पीठ माँ ज्वाल्पा देवी  से प्रार्थना है कि वह अथवाल बन्धुओं और थपलियाल बन्धुओं को सद्बुद्धि और वे तन, मन और धन से माता की सेवा करते रहे और उनका कल्याण हो।
कलियुग के प्रभाव से आज सर्वसाधन सम्पन्न मानव भी चिन्ताओं से ग्रस्त दिखाई देता है। लौकिक दृष्टि से सुख के सभी साधन प्राप्त कर लेने के उपरान्त भी उसको मानसिक शान्ति नही मिलती। किसी न किसी सांसारिक अभाव के कारण उसके मन में चिन्ता की उत्पति होती रहती है जो उसे शन्ति से नही बैठने देती। किसी को शरीरिक सुख का अभाव है, किसी को धन का और किसी को विद्या का। संसार ये सुखी जीवन के लिये वृद्धि, धन और स्वस्थ शरीर की आवश्यकता होती है, पुराण साहित्य में इन तीनों की शान्ति के लिये महाशक्ति की उपासना करने का विद्यमान बताया गया।
(पूर्वजों द्वारा सुनी कथा पर आधारित है) 

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